इस भाग में पवित्र क़ुरआन के वो छंद है जो यीशु की परमेश्वर द्वारा सुरक्षा, उनके अनुयायियों, इस दुनिया में उनका दूसरा आगमन और पुनरुत्थान के दिन उनका क्या होगा, इन सब के बारे में बताता है।
ईश्वर के पैगंबरो में विश्वास मुस्लिम आस्था का एक मुख्य हिस्सा है। भाग 2 में पैगंबर मुहम्मद (ईश्वर की दया और कृपा उन पर बनी रहे) से पहले, लूत से यीशु तक मुस्लिम धर्मग्रंथों में वर्णित सभी पैगंबरो का परिचय है।
कई लोग गलती से मानते हैं कि इस्लाम दुनिया में मौजूद अन्य धर्मों के अस्तित्व को सहन नहीं करता है। यह लेख स्वयं पैगंबर मुहम्मद द्वारा अन्य धर्मों के लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए रखी गई कुछ नींवों पर चर्चा करता है, उनके जीवनकाल के व्यावहारिक उदाहरणों के साथ। भाग 2: पैगंबर के जीवन के और उदाहरण जो अन्य धर्मों के प्रति उनकी सहनशीलता को दर्शाते हैं।
इस दूसरे लेख में वास्तविक उदाहरण और कहानियां है जिससे हमें यह पता चलेगा की हर व्यक्ति की जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं होती हैं जिस पर उसका नियंत्रण होता है और कुछ ऐसी बाधाएं होती हैं जिस पर उसका नियंत्रण नही होता और जो बाधाएं उसके नियंत्रण से बाहर हो उसे सर्वशक्तिमान ईश्वर की तरफ से तक़दीर मान लेना चाहिए।
मुख्य वक्ता: Dr. Bilal Philips (transcribed from an audio lecture by Aboo Uthmaan)
मरयम की इस्लामी अवधारणा पर चर्चा करने वाले तीन लेखों का तीसरा और आखिरी लेख: भाग 3: यीशु का जन्म, और इस्लाम द्वारा यीशु की माँ मरियम को दिया गया महत्व और सम्मान।
सबसे महान साथियों में से एक, सलमान फारसी, जो कभी पारसी (मगीन) थे, ईश्वर के सच्चे धर्म के लिए अपनी खोज की कहानी बताते हैं। भाग एक: पारसी धर्म से ईसाई धर्म तक।
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